परिचय (Introduction)
क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहास के पन्नों में दर्ज “काला पानी” (Kala Pani) शब्द सुनते ही लोगों की रूह क्यों कांप जाती थी? यह सिर्फ एक जेल नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक जीता-जागता नर्क था।
अंडमान निकोबार द्वीप समूह की खूबसूरती के बीच छिपी सेलुलर जेल (Cellular Jail), जिसे हम काला पानी के नाम से जानते हैं, ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता का सबसे बड़ा गवाह है। यहाँ की दीवारों ने जितने दर्द और चीखें सुनी हैं, शायद ही दुनिया की किसी और इमारत ने सुनी हों।
इस ब्लॉग पोस्ट में, हम काला पानी की सजा के उस खौफनाक सच से पर्दा उठाएंगे, जिसे जानकर आज भी दिल दहल जाता है।
काला पानी क्या था? (What was Kala Pani?)
‘काला पानी‘ दो शब्दों से मिलकर बना है—’काला’ (मृत्यु का रंग) और ‘पानी’ (समुद्र)। इसका मतलब था एक ऐसी जगह जहाँ से वापस आना लगभग नामुमकिन था।
यह जेल भारत की मुख्य भूमि से हजारों किलोमीटर दूर पोर्ट ब्लेयर (Port Blair) में स्थित थी। चारों तरफ गहरा समुद्र होने के कारण, यहाँ से भागने की कोशिश करना सीधे मौत को गले लगाने जैसा था। ब्रिटिश सरकार ने इसे विशेष रूप से उन क्रांतिकारियों के लिए बनाया था जो देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे, ताकि उन्हें समाज से पूरी तरह काट दिया जा सके।
सेलुलर जेल की बनावट: एक अभेद्य किला
सेलुलर जेल का निर्माण 1896 में शुरू हुआ और 1906 में बनकर तैयार हुआ। इसकी बनावट अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक क्रूरता का नमूना थी।
- 7 विंग्स (Wings): जेल को एक साइकिल के पहिये की तरह डिजाइन किया गया था, जिसमें 7 अलग-अलग विंग्स थे और बीच में एक सेंट्रल टॉवर था।
- एकल कोठरियां (Solitary Confinement): इसमें कुल 693 कोठरियां थीं। हर कोठरी का आकार केवल 4.5 x 2.7 मीटर था।
- रोशनदान: कोठरी में 3 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटा सा रोशनदान होता था, जिससे कैदी न तो बाहर देख सकता था और न ही दूसरे कैदी से बात कर सकता था।
- सेंट्रल टॉवर: बीच में मौजूद टॉवर से पहरेदार हर वक्त कैदियों पर नजर रखते थे।
महत्वपूर्ण तथ्य: जेल को इस तरह बनाया गया था कि एक विंग के कैदी को यह भी पता नहीं चलता था कि बगल वाली विंग में कौन बंद है। इसे “आइसोलेशन” या एकांतवास की सजा कहा जाता था।
काला पानी की खौफनाक सजाएं (Tortures in Cellular Jail)
काला पानी का नाम सुनते ही कैदियों के पसीने छूट जाते थे, क्योंकि यहाँ दी जाने वाली यातनाएं इंसानियत की सारी हदें पार कर देती थीं।
1. कोल्हू का बैल बनाना (Oil Grinding)
यह यहाँ की सबसे कठिन सजा थी। कैदियों को बैलों की जगह कोल्हू (तेल निकालने वाली मशीन) में जोता जाता था।
- हर कैदी को दिन भर में करीब 30 पाउंड नारियल का तेल या 10 पाउंड सरसों का तेल निकालना होता था।
- लक्ष्य पूरा न होने पर उन्हें कोड़ों से बुरी तरह पीटा जाता था।
2. कोड़ों की मार (Flogging)
छोटी सी गलती पर कैदियों को एक खास फ्रेम (Tiking Frame) से बांध दिया जाता था। इसके बाद जेलर उन्हें नंगा करके कोड़ों से मारता था। कई बार खाल उधड़ जाती थी और कैदी बेहोश हो जाते थे।
3. खड़ी हथकड़ी (Standing Handcuffs)
इसमें कैदियों को दीवारों पर लगी जंजीरों से हफ्तों तक खड़ा रखा जाता था। वे न तो बैठ सकते थे, न ही सो सकते थे। कई बार इस स्थिति में ही उन्हें शौच आदि करना पड़ता था।
4. टाट के कपड़े और खराब खाना
कैदियों को पहनने के लिए टाट (Jute) के खुरदरे कपड़े दिए जाते थे, जिससे त्वचा छिल जाती थी। खाने में उन्हें उबली हुई घास और कीड़े-मकोड़े वाली रोटियां दी जाती थीं। पीने का पानी भी सीमित और गंदा होता था।
प्रमुख क्रांतिकारी जिन्हें काला पानी भेजा गया
इस जेल ने भारत के कई महान सपूतों का बलिदान देखा है। इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं:
- वीर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar): उन्हें 1911 में यहाँ लाया गया और दो जन्मों का कारावास (50 साल) की सजा दी गई। उन्होंने जेल की दीवारों पर पत्थरों से कविताएं लिखीं।
- बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt): भगत सिंह के साथी, जिन्होंने असेंबली में बम फेंका था। उन्होंने यहाँ कैदियों के अधिकारों के लिए लंबी भूख हड़ताल की।
- योगेंद्र शुक्ल (Yogendra Shukla): बिहार के महान क्रांतिकारी, जिन्हें यहाँ इतनी यातनाएं दी गईं कि उनका शरीर पूरी तरह टूट गया।
- भाई परमानन्द: गदर पार्टी के नेता, जिन्हें भी यहाँ कठोर कारावास झेलना पड़ा।
जेल से भागने की कोशिशें
इतना कड़ा पहरा होने के बावजूद, कुछ कैदियों ने भागने की कोशिश की।
- मार्च 1868 में 238 कैदी भागने में सफल हुए थे (जेल निर्माण से पहले के समय में)।
- लेकिन समुद्र और जंगलों के कारण वे ज्यादा दूर नहीं जा सके।
- पकड़े जाने पर 87 लोगों को फांसी दे दी गई।
इससे यह साफ हो गया कि काला पानी से बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है—मौत।
निष्कर्ष (Conclusion)
काला पानी या सेलुलर जेल आज एक राष्ट्रीय स्मारक (National Memorial) है, लेकिन इसकी ईंटें आज भी उस दर्दनाक अतीत की गवाही देती हैं। यह जगह हमें याद दिलाती है कि हमारी आजादी मुफ्त में नहीं मिली है; इसके लिए हजारों वीरों ने अपनी जवानी और जान इस ‘नर्क’ में कुर्बान कर दी।
अगर आप कभी अंडमान जाएं, तो सेलुलर जेल जरूर देखें। वहाँ का लाइट एंड साउंड शो (Light and Sound Show) उन वीरों की गाथा को जीवंत कर देता है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1: काला पानी की सजा क्या होती थी?
Ans: काला पानी की सजा में कैदियों को अंडमान की सेलुलर जेल में एकांतवास में रखा जाता था। उन्हें कोल्हू से तेल निकालने जैसे कठोर श्रम और अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं।
Q2: सेलुलर जेल को काला पानी क्यों कहा जाता है?
Ans: ‘काला’ का अर्थ मृत्यु और ‘पानी’ का अर्थ समुद्र है। चारों ओर समुद्र से घिरे होने के कारण यहाँ से लौटना मृत्यु के समान असंभव माना जाता था, इसलिए इसे काला पानी कहा गया।
Q3: काला पानी जेल में सबसे प्रसिद्ध कैदी कौन थे?
Ans: वीर सावरकर, बटुकेश्वर दत्त, और भाई परमानन्द जैसे कई महान स्वतंत्रता सेनानी यहाँ कैद रहे।
Q4: क्या आज भी काला पानी की सजा दी जाती है?
Ans: नहीं, भारत की आजादी के बाद इस जेल को बंद कर दिया गया। अब यह एक राष्ट्रीय स्मारक और पर्यटन स्थल है।
Q5: सेलुलर जेल में कुल कितनी कोठरियां थीं?
Ans: सेलुलर जेल में कुल 693 कोठरियां थीं, जिन्हें विशेष रूप से कैदियों को एक-दूसरे से अलग रखने (Solitary Confinement) के लिए बनाया गया था।